एक यात्रा के तीन दशक
पत्रकारिता और संचार का यह विश्वविद्यालय जिस महापुरुष के नाम पर स्थापित है, भारत में उनकी प्रतिष्ठा “एक भारतीय आत्मा’ के रूप में है। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी अपने समय में केवल एक राष्ट्रवादी कवि या प्रखर संपादक ही नहीं थे, वे भारत के स्वाधीनता संघर्ष के सेनानी भी थे। एक महान् लक्ष्य के लिए स्वयं को समर्पित करने वाले मनीषी।
मध्यप्रदेश में 35 साल पहले उनके नाम को समर्पित पत्रकारिता के इस विश्वविद्यालय की यात्रा भोपाल में त्रिलंगा के एक छोटे से भवन में आरंभ हुई थी। इस बीच शहर में तीन और ठिकानों से होते हुए यह विश्वविद्यालय आज बिशनखेड़ी के 50 एकड़ के विस्तृत और भव्य परिसर में स्थापित है। भोपाल से बाहर इसके तीन परिसर हैं-रीवा, खंडवा और दतिया। मुझे गर्व है कि मैं इसके दूसरे बैच का एक विद्यार्थी हूँ। मुझ जैसे देश भर के हजारों युवाओं को जीवन की दिशा यहीं मिली है।
हम जानते हैं कि शिक्षण संस्थानों के निर्माण और विकास एक निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। किसी पीढ़ी में कोई विचार करता है, कोई उसे आकार देता है, कोई उसे समयानुकूल भव्यता से सजा देता है। एक-एक ईंट लगती-जुड़ती रहती है। किंतु पत्रकारिता और संचार जैसे विषय में यह केवल उसका बाहरी स्वरूप है। इमारतें कितनी भी भव्य हों, वे निर्जीव संरचनाएँ ही हैं। शिक्षण और शोध की गहराई और ऊंचाई उनमें प्राण प्रतिष्ठित करती है।
मैं मानता हूँ कि इस विश्वविद्यालय की वास्तविक पहचान उन हजारों प्रतिभा संपन्न विद्यार्थियों से है, जो देश भर के मीडिया संस्थानों, संचार समूहों, टीवी, सिनेमा और विज्ञापन जगत में निरंतर अपना उत्कृष्ट योगदान दे रहे हैं। यह मार्ग सेवा के दूसरे सरकारी या निजी क्षेत्रों से बिल्कुल अलग और कठिन है, जहां निरंतर संघर्ष करते हुए और विशुद्ध प्रतिभा के आधार पर स्वयं को निरंतर गढ़ते हुए ही वे मजबूती से स्थापित करने में सफल हो पाते हैं। कठिन प्रतिस्पर्धा में प्राप्त ऐसी सफलता बिना फौजी अनुशासन, कठोर परिश्रम और धैर्य के संभव नहीं है।
नई पीढ़ी की भाषा को लेकर चिंताएँ पहले से ही हैं किंतु बहुत तेजी से बदलती तकनीक में चुनौतियों के नए-नए फलक भी खुल रहे हैं। एआई एक ऐसी ही लहर की तरह है। इसे देखते हुए जमीनी पत्रकारिता और अकादमिक पक्ष के सामने चुनौतियाँ हर दिन गहरी हैं।
जब हम इस विश्वविद्यालय में पढ़े तब केवल समाचार पत्र और पत्रिकाएँ थीं। रेडियो वगैरह में सीमित अवसर थे। चौबीस घंटे के सैटेलाइट टेलीविजन न्यूज चैनलों का चमाचम दौर आया नहीं था। उड़ान भरने के लिए आकाश सीमित था। किंतु आज ऐसा नहीं है। आज दुनिया बदल चुकी है। इस विश्वविद्यालय ने बीते तीन दशक से अधिक समय की अपनी अनुभव संपन्न यात्रा में मीडिया जगत में आए अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को तैयार किया है।
मैं कहूँगा कि विश्वविद्यालय की अथक यात्रा अनवरत् है। हमारे प्रयासों के केंद्र में भारत है। लोककल्याण की विराट भारतीय दृष्टि है। यह विश्वविद्यालय एक भारतीय आत्मा के ही स्मरण में आस्थापूर्वक स्थापित है। पत्रकारिता के विश्वविद्यालय का पहला सपना माखनलाल चतुर्वेदी ने ही अपने जीवनकाल में देखा था।
विजय मनोहर तिवारी
कुलगुरु